ठोकरें
ठोकरें
कविता वाचक्नवी हर नदी के
गर्भ में
कैसा तराशा
रूप लेकर हम चले थे, आपकी ठोकर
हथोड़ों, दूमटों ने
तोड़कर या फोड़कर
आडा़ हमें तिरछा
किया है। (अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ" - २००५ से )...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[01 Oct 2009 10:51 AM]



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