गो कि

कुमार आशीष दिल के हलकों में छुपी गहराइयाँ और हर सूँ ढेर सी रुसवाइयाँ लौ सरीखी रात भर हिलती रहीं आँसुओं की भाप में सच्‍चाइयाँ दिल ने नज़रों में उतर करके कहा आइनों में सिर्फ हैं परछाइयाँ मुझको आखिर ले चलोगे किस तरफ छूट जायेंगी मेरी तनहाइयाँ जज्ब की मुझमें ही है श... [पूरी पोस्ट]
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[01 Oct 2009 06:08 AM]

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