गज़ल : सीने में उबलता तेज़ाब रख

कवितायन मन में सुलगते जवाब रख दिल में अपने हिसाब रख वक्त का घोड़ा किस तरह दौड़े पैरों में अपने रकाब रख तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे ख्वाबों पे अपने नकाब रख मय क्या जो सुबह उतर जाये इरादों में हौंसले की शराब रख झूठ का गर्द चेहरा जर्द कर देगा बातों में सच का हिज़ाब... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[01 Oct 2009 04:42 AM]

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