kabir- chahat
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥ जब आदमी को लगता हैं की ,मुझे यह चाहिए ,मुझे ओ चाहिए, लेकिन मिलाता वही हैं जो आपको मिलाना है हमारी चाहतों की कोई सीमा रेखा नहीं होती लेकिन हर एक को कुछ ना चाहिए होता जो आदमी पैदल चलता...
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Truth or Dare
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[28 Sep 2009 13:03 PM]



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