एक शाम की भूख और पचास हजार की रोटी..

काहे को ब्याहे बिदेस.... पता नहीं क्यों उसे लगने लगा है परिवार में उसका अस्तित्व ऐसा ही है जैसे शेल्फ पर रखी किताब का है, दीवार पर लगी घड़ी का है, मेज पर रखी चाबी का है, धुप में काले चश्में का है, बरसात में छाते का है, जाड़े में गर्म कोट का है ...वो सभी अमूर्त और अद्रश्य रहते... [पूरी पोस्ट]
writer neera
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[30 Sep 2009 19:33 PM]

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