ग़ज़ल

नई क़लम  - उभरते हस्ताक्षर शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुभने लगा है , नदी दम तोड़ बैठी तषनगी से समंदर बारिशों में भीगता है, कभी जुगनू कभी तितली के पीछे मेरा बचपन अभी तक भागता है, सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर लहू सब की रगों में दोड़ता है, जवानी क्या मेरे बेटे पे आई मेर... [पूरी पोस्ट]
writer नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[30 Sep 2009 17:56 PM]

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