क्वार गीत
रास्ते में जब रुकी तो दीवारों के कान उग आए थे पत्तों की सरसराह्ट थी आँगन में बुदबुदाहट थी और दीवारों की आँखों में रंग भर गए थे कपाट पर कूची से बूटे खिले थे सफ़ेद पुती दीवार पर जलाशय बने थे बाहर अहाते में तिमिर का कोलाहल बोल रहा था झींगुर की आवाज़े थीं...
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रजनी भार्गव
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[30 Sep 2009 15:44 PM]



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