कुँवरनारायण

सागरिका चारों ओर लौह - मौन गुम्बद - सा अंधकार जिसकी दीवारों से टकराती आवाजें ये केवल सन्नाटे को और झनझनाती हैं. *** *** *** *** समय के केंचुल सरीखा रास्ता. मारकर खाया हुआ - सा पड़ा चारों ओर खाली नगर - पंजर ... लुंज दीवारें - सहारे डरी, सिकुड़ी पड़ी कुछ परछाइ... [पूरी पोस्ट]
writer गुर्रमकोंडा नीरजा

स्रवंति

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[30 Sep 2009 15:14 PM]

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