सोशल- एडजस्टमेंट
प्लास्टिक के टुकड़े की तरह चिटक-चिटक जाती हैं मन की कोमल भावनाएँ और बार-बार विवशता का फ़ेवीकोल लगा कर जोड़ा जाता है मन... सोशल एडजस्टमेंट इसी को तो कहते हैं !...
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मीनू खरे
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[30 Sep 2009 11:33 AM]



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