दफ़्अतन
कहीं चाँदनी पिघली होगी शायद कहीं रोशनी बरसी होगी शायद सफहों में कुछ नूर क़ैद था बरसों से धुंधली सी फ़लक में जो गुम गया था गर्द झाड़ी है तूने तो निकल आया है आज उफ़क पर तारीखों के बाद इस रोज़न से दफ़्अतन मुझे मेरे हिस्से का चाँद नज़र आया है.. -- 1510...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
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[30 Sep 2009 11:15 AM]



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