कब समाप्त होगा शोक का यह हिमयुग!

आज़ाद लब शोक मन का दीमक है. तन को तो यह घुन की तरह खाता रहता है. तिस पर मृत्यु का शोक घातक है. शोकग्रस्त माँ कहीं की नहीं रह जाती. जिसका २० साल का बेटा घर लौटते समय एक दुर्दांत डम्पर की चपेट में कुचलकर पल भर में मारा जाए उस माँ की अवस्था का वर्णन करने के लिए... [पूरी पोस्ट]
writer विजयशंकर चतुर्वेदी
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[30 Sep 2009 07:22 AM]

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