दिन है बड़ा मटमैला सा
अब न शाम-सहर दिन है बड़ा मटमैला सा उड़ गया चैन मेरे हाथों से नीँद की ही तरह अब न शाम- सहर रातें जो न हों तारों भरी हम जुगनू लेकर चल लेते छल करता है सूरज जब-जब छाया का टुकड़ा दे दे कर दिन का है कहो , ये कौन पहर अब न शाम- सहर दिन कब होते सब एक से हैं छाय...
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शारदा अरोरा
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[30 Sep 2009 04:14 AM]



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