बड़ी हैं सीमायें मगर...
ज़िंदगी गुम हो रही है आधुनिकता ढो रही हैं खिंच रहा है बेलगाम मन चमचमाती खनक सुन कर छिछले होते जा रहे अनूभूति के गहरे समंदर बन गया है आदमी अब एक मन रहित सा पुर्ज़ा भावनायें प्रेम विरह सब अट्ठहास सी कर रही हैं हृदय स्वार्थी हो गया है एकनिष्ठता मूर्खता है...
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मानसी
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[29 Sep 2009 22:45 PM]



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