कौटिल्य दर्शन-कभी कछुआ तो कभी साँप बन जाएँ (kautilya niti-kabhi saanp kabhi kashuaa bane)
मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः। अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।। हिंदी में भावार्थ- बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जा...
[पूरी पोस्ट]
दीपक भारतदीप
dharm
30
0
0
0
0
[29 Sep 2009 21:30 PM]



Shuffle







