खिड़की से आकाश ......!
खिड़की से आकाश अपने सीमित फलक वाला दिखता है क्षितिज का भी अपना पता नहीं यह बोध कब होगा...! ऐसा क्यों होता है कमरे में बैठ कर सामान्य चर्चाओं में नुक्ताचीनी आकाश ऐसा है आकाश वैसा है खुद को आवरण में रखकर बेहतर अभिव्यक्ति की अपेक्षा संभव है....? किसी भी...
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हेमन्त कुमार
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[28 Sep 2009 21:40 PM]



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