ज्ञान पर , वैभव पर साम्राज्यवादी पिपासा की विजय ...
बचपन से न जाने कितने रूपों में, कितने अलग अलग संस्करणों के चेहरे लगाए रामायण की कथा सुनते पड़ते आयें हैं....यह रामचरितमानस है , गोस्वामी तुलसीदास की लिखी हुई ...यह रामायण है ...वाल्मीकि की ...यह कंबन की ....यह दक्षिण भारतीय , और यह पश्चिम प्रांतीय !...
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विक्षुब्ध सागर
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[28 Sep 2009 13:10 PM]



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