घर छोड़ के ना जाओ सैंयां हम लोग पड़ें तोहरे पैंयां.
ग़ज़ल अय ब्लागे-चमन देखो तो सही ये कैसे ज़माने आये हैं. ये कल के लेंड़ हगे हमको ब्लागिंग समझाने आये हैं. चड्डी को उतारे फिरते थे अपने जो मुहल्ले के छोरे, आया जो बुढ़ापा अब अपना आँखें वो दिखाने आये हैं. सब मिल के करें ऐसी-तैसी वे सहन करें बोलो कब तक ?...
[पूरी पोस्ट]
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[28 Sep 2009 04:18 AM]



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