लिखी मैंने एक गजल: "रूबरू"

Shreesh UVACH लाख सोचों ना हो वो रूबरू यारों, सोच लेने के भरम में दुनिया यारों.   साथ देते रहे हर लम्हा मुस्कुराते हुए, शाम हर रोज गिला करके सो जाती यारों.   मेरी हर साँस फासले कम करने में गयी, हर सहर, मंजिलें अपनी खो जाती यारों.   जबसे जागा है, सुन... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीश पाठक 'प्रखर'
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[28 Sep 2009 02:18 AM]

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