जिंदगी कुछ वक्‍त दे मुझे

मोहन का मन मेरा अपना घर जिससे हूं मैं दूर बहुत दूर गाहे बगाहे घर जाना और  जल्‍दी से घर से लौट वापस आना क्‍या यही है जिंदगी क्‍या यही है जिंदगी का दस्‍तूर घर पर है मेरी बीमार मां बीमार पिता और मैं अकेला दूर घर से बहुत दूर ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं न... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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[27 Sep 2009 07:51 AM]

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