गोरा का पुनर्पाठ
रवीन्द्रनाथ का गोरा पुनरुत्थान में अंतर्निहित बंधे हुए, क्षुद्र और विछिन्न हिंदुत्व के छद्म को उजागर करनेवाला विलक्षण और क्लासिक उपन्यास है। यह सही मायने में संकीर्ण हिंदुत्व का साहसपूर्ण और ओजस्वी जवाब है। प्रस्तुत है इस उपन्यास का पुनर्पाठ: संकीर्ण...
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डॉ.माधव हाड़ा
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[27 Sep 2009 05:21 AM]



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