आखिरी अलविदा.....

अपूर्ण कुछ देर, इक दिन या इक हफ्ता बस ! यही कह कर गए थे न तुम ? और ये उम्मीद जगी रह गई वापसी की....... शायद मुसलसल मिलती रही माफियाँ बेफिक्र कर गई मुझको खौफ ही न रहा, कि कोई लकीर भी है हमारे दरमियाँ शायद मैं ही न समझ पाया था या दोस्ती या फिर लकीरें या फिर भ... [पूरी पोस्ट]
writer Nipun
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[21 Jul 2009 09:56 AM]

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