खाना बनातीं स्त्रियाँ
अनेक दोस्तों के आग्रह पर यह कविता यहां दे रहा हूं। शायद पसंद की जायेगी। पसंदगी से ज्यादा शायद इस स्थिति पर विचार किया जाये, जैसी इस समाज में हमने स्त्रियों की बना ही दी है। नियति की तरह। खाना बनातीं स्त्रियाँ जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया फि...
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कुमार अम्बुज
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[21 Jul 2009 06:54 AM]



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