कैसी कैसी सरहदें

हया धर्म की कुछ जात की कुछ हैसियत की सरहदें आदमियत की जमीं पर कैसी कैसी सरहदें मुल्क को तो बाँट लें लेकिन ये सोचा है कभी दिल को कैसे बाँट सकती हैं सियासी सरहदें माँग भर कर उसने मेरी मांग ली आज़ादियाँ अब क़फ़स है और मैं हूँ या सिन्दूरी सरहदें मैं मोहब्बत... [पूरी पोस्ट]
writer लता 'हया'
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[21 Jul 2009 00:53 AM]

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