हविष ही उपजायेंगे ||

मा पलायनम ! बन हविष जल भी गये तो धूम हम बन जायेंगे धूम से फ़िर मेघ बन कर , हविष ही उपजायेंगे || गोल है दुनिया की माफिक परिधि जीवन मृत्यु की हैं चले जिस बिन्दु से हम , फ़िर वहीं आ जायेंगे || " शून्य " ही कह लीजिये , हमको कोई शिकवा नहीं " अंक " में जुड़ते गये तो " ला... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. मनोज मिश्र
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[20 Jul 2009 21:25 PM]

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