पुनर्वालोकन
स्पंदन" मेरे ह्रदय के स्पंदन से एक तरंग उठी भावनाओं में ढ़ल कर शब्द-बद्ध हुई इसे समझने को न केवल मेरी दृष्टि ही बल्कि चाहिए मेरे ह्रदय का सा स्पंदन और चाहिए भावना ऐसी ही किन्तु भावना-शून्य यह जग क्या समझ पाये गा इन शब्दों में छुपी मेरे अन्तस की प्रताड़...
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©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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[20 Jul 2009 07:47 AM]



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