मेरे हाथों से अब तक महक ना गई उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए.
ग़ज़ल मेरे हाथों से अब तक, महक ना गई, उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए. मेरी सांसों का जादू है अब तक ज़वां, हमने माना कि रिश्ते पुराने हुए. ये कसक,ये तड़प, ये जलन, ये धुआँ, उस मुहब्बत की बख़्शी ये सौगात है, साज़ो-आवाज़ ये, शेरो-शायरी, उनसे मिलने के...
[पूरी पोस्ट]
डॉ.सुभाष भदौरिया.
25
4
0
4
4
[19 Jul 2009 01:28 AM]



Shuffle








