वो सुन न सके

मन पखेरू फ़िर उड़ चला घूँघट की आड़ से, आँसुओं की धार में, पलके छुकाये वो कहती रही मगर.... वो सुन न सके दीवारें सिसकती रहीं कालीन भीगते रहे कातर निगाहों से उन्हे तकते रहे मगर... फ़िर भी वो सुन न सके एक वही थी जो उन्हे कह सकती थी बहुत कुछ मगर... घर में जोर से बोलने का हक सिर्... [पूरी पोस्ट]
writer सुनीता शानू
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[18 Jul 2009 14:04 PM]

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