हमारी अच्छी क़िस्मत

शुऐब पता नहीं किसका चेहरा देखकर नींद से जागे थे! सुबह बाहर निकलते फ़क़ीर से ही पाला पड़ना था? बासी मूंह लिए मूंह पर ही शिकायत ठोंका - बड़े नसीबों वाले हैं आप कि यूं बैठे बिठाए ख़ुदा बन बैठे और हमें देखो जनमसे भिखारी। पता नहीं कौनसी जड़ीबोटीयां खालिए थे कि... [पूरी पोस्ट]
writer शुऐब

खुदा से मिलो

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[18 Jul 2009 07:45 AM]

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