तुम आओगे दोस्त

मेरा कोना चंद लफ़्ज अब भी है मेरे पास तुम आओं तो कहूं... आओ न एक बार मिलकर बैठें वैसे ही... सच पर डालकर पर्दा देखें सपने जैसा कुछ-कुछ तुम्हे याद है क्या-क्या हम सोचा करते थें देखते-देखते सच हो गए सारे और हकीकत गुम गया आओ न! बैठें, बातें करें... शायद दूर हो जाए... [पूरी पोस्ट]
writer archana rajhans
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[18 Jul 2009 04:16 AM]

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