साहित्यिक महामानव मुर्दाबाद

असुविधा इस बार बडे व्यथित मन से गोरख पान्डे की एक ग़ज़ल लगा रहा हूं। पता नहीं कि वजन वगैरह बराबर है या नहीं। आप इसे ग़ज़ल ना मानना चाहें तो न माने…महत्वपूर्ण इसकी अर्थवत्ता है) रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबंदी का ज़ादू घटता जाए है रुख से उनके रफ़्ता-रफ़्ता परदा उतरता जाए है ऊंच... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक कुमार पाण्डेय
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[17 Jul 2009 00:57 AM]

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