आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं....

अपूर्ण आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं गुल कोई नया अब खिलाने चले हैं| कभी कोई आये खयालो में जैसा फिर समां आज वैसा बनाने चले हैं| खुदा से ही पूछो कहाँ जायेंगे अब खुद तो न जाने किस ठिकाने चले हैं| सबर अब न है ना ही कोई उम्मीदें आज खुद को ही हम आजमाने चले हैं|... [पूरी पोस्ट]
writer Nipun
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[16 Jul 2009 10:46 AM]

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