होंठो पर सजा के अपने वो जो गुनगुना गई मुझको
होंठो पर सजा के अपने वो जो गुनगुना गई मुझको इक लफ्ज़ था भुला हुआ ग़ज़ल बना गई मुझको किस - किस तूफा के बीच से बचा लाया न दिल को अपने कितनी यकता वो निगाहे हुस्न , जोकि पा गई मुझको न किसी की याद , कोई खुशी न कोई रंज - ओ - गम यह किस मुकाम पर हयात ले कर आ...
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Rahul kundra
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[16 Jul 2009 05:50 AM]



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