एक भाषा का विषाद काल
आलोक श्रीवास्तव की एक कविता-2 एक भाषा का विषाद काल मैंने नाविक से कहा
’ले चल मुझे भुलावा देकर’ युग से कहा
’ओ मेरे युग,
ले चल मुझे अपने साथ’
काल से कहा
’तुझमें अपराजित मैं वास करूं’ एक पराजित भाषा की
संकरी होती ज़मीन पर खड़े
मैंने दुख को ललकारा एक विरास...
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PRIYANKAR
कविताएं/Poems
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[16 Jul 2009 01:49 AM]



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