एक ग़ज़लनुमा रचना
पुराने वक्त में ये हादसा कई बार होता था अंधेरी रात में भी चाँद का दीदार होता था तुम्हारे दूर जाने ने बदल कर 'बॉर' कर डाला तुम्हारे साथ रहते जो कभी 'घर-बार' होता था उसी के वास्ते सब हो रहा अब इस जमाने में हमारे वास्ते जो देश का बाजार होता था कहीं खबरे...
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वीरेन्द्र जैन
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[15 Jul 2009 02:52 AM]



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