मेरी शर्म है मेरा ज़ेवर
हमने वीराने को गुलज़ार बना रखा है क्या बुरा है जो हकीक़त को छुपा रखा है दौरे हाज़िर में कोई आज ज़मीं से पूछे आज इंसान कहाँ तूने छुपा रखा है ? वो तो खुदगर्जी है ,लालच है, हवस है जिसका नाम इस दौर के इन्सां ने वफ़ा रखा है मैं तो मुश्ताक़ हूँ आंधी में भी...
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हया
poetry
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[15 Jul 2009 01:02 AM]



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