अपनी तो पाठशाला

चोंच में आकाश आजकल मैंने फिर से पाठशाला का रुख़ किया है। अब यह न पूछें कि क्या पढ़ा जा रहा है क्यों कि जो कुछ पढ़ा जा रहा है उसमें खास कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पढ़ने का वातावरण ही दिखाई नहीं देता। लगता है पूरा पाठ्यक्रम समाप्त होने तक यह मौसम बदलने वाला नहीं।कुछ... [पूरी पोस्ट]
writer पूर्णिमा वर्मन
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[14 Jul 2009 13:52 PM]

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