तरकीब...

अपूर्ण कोई तरकीब सोचता हूँ सूझती ही नहीं ताने बाने में इस फिर निकल पड़ता हूँ जब खोजने खुद को, शौक है शायद मेरा, अक्सर उग पड़ता है दिल में वर्षा में उगने वाली हरी घास की तरह, फिर सूख जाता है , एक दिन फिर उग पड़ता है अनायास ही बिलकुल जब कभी कोई एक डोर आ जाती... [पूरी पोस्ट]
writer Nipun
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[14 Jul 2009 11:38 AM]

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