घर

कवितायन घर, जिसकी दीवारों से सीलता हो बुजर्गों का आशीर्वाद उखड़ते प्लास्तर से झांकती हो दुआयें छतों से टपकता हो अपनापन या दहलीज लांघकर आ जाती हो बरकत, बारिश के पानी के साथ घर, जिसे नया बनाने के लिये माँ ने पापा से कितनी ही लड़ाईयाँ लड़ी हो कभी-कभी आँसू भी बहाये... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[14 Jul 2009 08:44 AM]

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