कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात
गतांक से "मौत पर कुछ कविताएँ" (4) "छलता यथार्थ" ऐ मौत तू कहीं छलावा तो नहीं जो जीवन के हर पल को अपनी धुंध से घेरे डराती रहती है तुझे तो मैंने एक यथार्थ की संज्ञा दी थी परन्तु यह कैसा यथार्थ है जो परत-दर-परत जीवन के अनसुलझे रहस्यों में छिपा है जिसे न...
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©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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[14 Jul 2009 05:32 AM]



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