भर्तृहरि नीति शतक-सत्यमार्गी कभी गुस्से में नहीं आते (gyani kabhi krodh nahin karte)

शब्दयोग सारथी-पत्रिका चाण्डालः किमयं द्विजातिरथवा शूद्रोऽथ किं तापसः किं वा तत्तविवेकपेशलमतियोंगीश्वरः कोऽपि किम्। इत्युत्पन्नविकल्पजल्पमुखरैराभाष्यमाणा जनैनं क्रुद्धाः पथि नैव तुष्टमनसो यांन्ति स्वयं योगिनः।। हिन्दी में भावार्थ- महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि कोई चाण्डाल है... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

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[14 Jul 2009 00:18 AM]

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