बरखा- अतीत के झरोखों से
बरखा किसी देवांगना के स्नात केशों से गिरे मोती विदाई में अषाढ़ी बदलियों ने अश्रु छलकाए किसी की पायलों के घुँघरुओं ने राग है छेड़ा किसी गंधर्व ने आकाशमें पग आज थिरकाए उड़ी है मिटि्टयों से सौंध जो इस प्यास को पीकर किसी के नेह के उपहार का उपहार है शायद...
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राकेश खंडेलवाल
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[12 Jul 2009 22:13 PM]



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