सपनों को खंगालता है मन
जाने कितने सपने पालता है मन फिर सपनों को खंगालता है मन नाज़ुक इतना कि टूटता रहता है खुद ही को फिर संभालता है मन खुद ही के खिलाफ बयान देकर अपना भडा़स निकालता है मन कभी बच्चों सा मचल जाता है कभी हर बात को टालता है मन आसमान छूने की आरज़ू इसकी गेंद सा खुद...
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Razia
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[12 Jul 2009 19:49 PM]



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