हिमाल : अपना-पहाड़

हिमाल : अपना-पहाड़ सब हंस रहे थे। हंसी बेहया सी अपने आप मुंह पर तैर रही थी। पुरुषों की नज़र बेहयायी से उसे घूर रही थी। लेकिन महिलाएं भी भूल गयी थी, कि उन्हें ऐसा नहीं करना है। वो भी उसे इसी अंदाज़ में देख रही थी। वो भूल गयीं थी कि सड़क पर आते-जाते उन्हें भी ऐसी ही नज़र... [पूरी पोस्ट]
writer जितेंद्र भट्ट
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[12 Jul 2009 12:12 PM]

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