बागबाँ
मैं गुलाब था खुशबु भरा, मुझे आँधियों ने हिला दिया, जो मुझे बचाने को बने थे , मेरे उन काँटों ने मुझे ही रुला दिया। तोडा मुझे, फिर तोड़ के फेंका मुझे, और पैरों तले मसल दिया। वक्त साज़िश करता रहा, पर मेरे साथ मेरा ख़ुदा रहा , जो संभाल ले मुझे प्यार से ऐसे...
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महफूज़ अली
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[11 Jul 2009 12:37 PM]



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