मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं

सृजन और सरोकार मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मेरी बुलन्दियों से हमेशा मुख़ालिफ़त रही और गहराइयों के प्रति मक़नातीसी खिंचाव इसी सबब मुझसे इक समन्दर दरयाफ़्त हो गया ज़मीं मुझे बुलन्दियों के सिम्त सफर पर देखना चाहती थी और समन्दर मुझे अपन... [पूरी पोस्ट]
writer रवि कुमार, रावतभाटा
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[11 Jul 2009 08:06 AM]

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