‘मौनम् सर्वार्थ साधनम्’ (तुम स्वयं को स्वामी क्यों कहते हो ई-स्वामी?)
अहंकार का विष साधुओं को भी नहीं छोडता. तुलसीदास, कबीर, रैदास आदी सब अपनी रचनाओं में कहीं ना कहीं अपने नाम डाल कर छोड गए - ‘…देख कबीरा रोया’ ‘…तुलसीदास सदा हरि चेरा’ ‘बुल्ला की ज़ाणां मैं कौंन..’ नाम का अहंकार क्यों होना चाहिए? क्या उन्हें ये चिन्ता क...
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eswami
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[10 Jul 2009 16:25 PM]



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