हम नहीं सुधरेंगे

ये है इंडिया मेरी जान भले ही जगह-जगह यह लिखा हुआ मिल जाए कि दुर्घटना से देर भली घर पर बच्चे आप की प्रतीक्षा में होंगे...मगर इन्हें जो अपनी जान से जरा सा भी प्यार होता या फिर परिजनों की चिंता होती तो क्या ऐसे जान-जोखिम में डाल कर सफर करते? फिर भी हम तो यहीं दुआ करते है कि... [पूरी पोस्ट]
writer सचिन मिश्रा
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[10 Jul 2009 14:00 PM]

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