संत कबीर वाणी-अंधे हाथी छूकर करते हैं अपना अपना बखान (andhon ka hathi-sant kabir vani)
भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक। जो पै भीतर लखि पर, भीतर बाहिर एक। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंदर तो प्रवेश किया नहीं पर उस आत्ममय रूप के बाहर अनेक वर्णन किये जाते हैं। एक बार अगर हृदय में उस आत्मा रूप को समझ लें तो फिर अंदर बाहर एक जैसे हो...
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दीपक भारतदीप
dharmआत्म-विकास
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[10 Jul 2009 00:23 AM]



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