बनयान ट्री के नीचे लिखी एक कविता
बह चली थी ये कश्ती जिस मांझी के सहारे इक दिन पड़ा दिखायी वो किसी और ही किनारे क्यों झूठ की पतवार से सफ़र तय किये सारे क्यों लगते थे वो अपने जो कभी थे नहीं हमारे ये सोच रही कश्ती, सांझ ढली, अब किसको पुकारे कश्ती ये बनी तिनका -जो बहता है बेसहारे तिनके...
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WindEnergyMan
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[08 Jul 2009 21:09 PM]



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