मुलाकात...
तुम तो कहतीं थी, मेरे द्वार खुले हैं हरपल तुम्हारे लिए! पर वहाँ एक ताला था। मैं सीढियों पर बैठा, करता रहा तुम्हारा इंतज़ार १ घंटा दो घंटे विवश!! आखिर मैंने खिड़की से झाँका... सुखा गुलाब का फूल, एक किताब और मोर पंख.... फिर हवा का एक तेज़ झोंखा आया और.....
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मीत
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[08 Jul 2009 02:02 AM]



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